विवेक दिशा

120.00150.00

ISBN संख्या – 978-81-997900-7-0
पृष्ठ संख्या – 112
लेखक – सुयश त्यागी

’विवेक दिशा’ स्वामी विवेकानंद के विचारों से युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक

स्वामी विवेकानंद न केवल भारत के एक महान संत, दार्शनिक और देशभक्त थे, बल्कि वे युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत भी हैं। उन्हीं के विचारों, उपदेशों और जीवन-दर्शन को सरल भाषा में संकलित करके लिखी गई सुयश त्यागी द्वारा पुस्तक “विवेक दिशा” आज के भटके हुए युवा मन के लिए एक दीपक की तरह है।

“विवेक दिशा” नाम ही अपने आप में सब कुछ कह देता है। ‘विवेक’ अर्थात सही-गलत में अंतर करने की शक्ति और ‘दिशा’ अर्थात जीवन को सही मार्ग पर ले जाने वाला रास्ता। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य युवाओं को आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण, देशभक्ति और आध्यात्मिक शक्ति से भरना है। स्वामी जी मानते थे कि “युवाओं में वह शक्ति है जो राष्ट्र को बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है।” इसी सोच के आधार पर इस पुस्तक में उनके भाषणों, शिकागो धर्म सभा के उद्बोधन, पत्रों, व्याख्यानों और महत्वपूर्ण प्रसंगों से प्रेरणादायक अंश चुने गए हैं।

स्वामी जी कहते थे “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” पुस्तक में इस मंत्र को आधुनिक युवाओं की शिक्षा, करियर और जीवन की चुनौतियों से जोड़ा गया है। यह सिखाती है कि असफलता से डरो मत, वह सफलता की पहली सीढ़ी है। लेखक ने स्वामी जी के इस विचार को प्रमुखता दी है कि “शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री लेना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करना है।” पुस्तक युवाओं को अनुशासन, सत्य, संयम और सेवा का महत्व समझाती है।

साथ ही “दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है” इस विचार के माध्यम से पुस्तक युवाओं को समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और कमजोरों की मदद के लिए प्रेरित करती है l आज का युवा सोशल मीडिया, प्रतियोगिता और करियर के दबाव में उलझा हुआ है। उसे दिशा नहीं मिल पा रही। यह पुस्तक उपदेश नहीं देती, बल्कि स्वामी जी के जीवन के उदाहरणों से सिखाती है। जब युवा पढ़ता है कि कैसे स्वामी जी ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी, तो उसे अपने जीवन में संघर्ष करने की शक्ति मिलती है।

“विवेक दिशा” केवल एक किताब नहीं है, यह एक अलौकिक जीवन का सार है। जैसा स्वामी जी ने कहा था, “तुम्हारे अंदर अनंत शक्ति है। उसे जगाओ और संसार को प्रकाशित करो।”

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ISBN

9788199790070

Number Of Pages

112

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