संघ शताब्दी वर्ष की एक नई और प्रमुख पुस्तक प्रस्तुत है।
सन १९४७, १५ अगस्त के पश्चात भी स्वातंत्र्य समर चला है। संघ के स्वयंसेवकों की उसमें भूमिका रही है। ऐसे प्रेरक जीवनचरित, ऐतिहासिक गाथा का स्मरण कराती पुस्तक👇
पुस्तक का नाम – संघर्ष स्वाधीनता का
लेखक – रमेश शर्मा
प्रकाशन – अर्चना, भोपाल
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यह पुस्तक केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि इतिहास की दृष्टि, इतिहास के विश्लेषण, उसमें निहित धारणाओं, सामाजिक जीवन की विशेषताओं और विचार के सतत प्रवाह का समन्वित अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह स्मरण दिलाती है कि विचारों का प्रवाह अनंत है; हर व्याख्या के बाद नई संभावनाएँ खुलती हैं और हर युग अपने अनुरूप विचारों का विस्तार माँगता है। इसी दृष्टि से इस पुस्तक में प्रस्तुत सभी विचार समय की मांग, आधुनिक परिस्थितियों और राष्ट्र-जीवन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर संयोजित किए गए हैं।
अंततः, यह कृति केवल इतिहास नहीं, बल्कि राष्ट्रभाव की अखंड लौ को प्रज्वलित करने वाला जीवंत दीपक है। यह अतीत का गौरव, वर्तमान का बोध और भविष्य का संकल्प तीनों एक साथ प्रदान करती है। पाठक जब इसे पढ़ता है, तो वह केवल ज्ञान से समृद्ध नहीं होता—बल्कि वह अपने भीतर उस राष्ट्रीय चेतना को सक्रिय पाता है, जिसने भारत को हजारों वर्षों से एकसूत्र में बाँधकर रखा है।









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