पंडित जी किसी भी क्षेत्र में यथास्थितिवादी नहीं थे उनका मत था कि समाज रचना में मकड़ी के पुराने जालों को झाड़ पोंछकर समाज को युग के अनुकूल नया मोड़ देना चाहिए सामाजिक विषयों में उन्होंने क्रांति का समर्थन नहीं किया तो उसी प्रकार यथास्थिति वाद्य का भी नहीं किया उनका मार्ग पुनर्जागरण का था और उनका मानना था कि उसके लिए समाज के सभी घटकों में परस्पर सामंजस्य रखकर धैर्यपूर्वक अभिश्ट मार्ग पर चलते रहना आवश्यक है
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₹5.00एकात्म मानव दर्शन
₹60.00₹65.00
पृष्ठ संख्या – 64
आईएसबीएन नंबर – 9788168505292
| ISBN | 9788168505292 |
|---|---|
| book-author | |
| Number Of Pages | 64 |
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