प्रो. उमेश कुमार सिंह द्वारा रचित “स्व का बोध: स्व की गौरवशाली परंपरा” एक प्रेरक और चिंतनशील पुस्तक है, जो भारतीय जीवन दर्शन में ‘स्व’ (आत्मबोध) के महत्व को उजागर करती है। लेखक बताते हैं कि ‘स्व’ केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र का भी आत्मबोध है।
पुस्तक का आरंभ इस विचार से होता है कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र — तीनों के जीवन सूत्र ‘स्व’ से जुड़े हैं। लेखक का कहना है कि भारत के पिछले एक हज़ार वर्षों में विदेशी आक्रमणों (विशेषतः इस्लामी आक्रमणों) ने भारतीय संस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावित किया, जिससे समाज में रूढ़िवादिता और हीन भावना बढ़ी।
लेखक ने स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, और अन्य महान भारतीय विचारकों के उदाहरणों द्वारा यह स्पष्ट किया है कि स्व का बोध तभी संभव है जब व्यक्ति अपने अंदर स्वाभिमान, स्वाधीनता, स्वावलंबन, स्वदेशी भावना, और स्वतंत्रता का विकास करे।
पुस्तक यह संदेश देती है कि “स्व का जागरण ही राष्ट्र के पुनर्जागरण का आधार है।”
🏢 प्रकाशक:अर्चना प्रकाश










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