पुस्तक का नाम: लोकमाताएँ : माँ नर्मदा, गंगा, तपती-ताप्ती
लेखक: धीर सिंह पवैया
इस पुस्तक में यह माना गया है कि भारत का वास्तविक अर्थ उसकी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों के सम्मिश्रण में निहित है। यदि इन तीनों अवयवों को जोड़कर कोई जीवंत और कालजयी शब्द बनता है, तो वह है संस्कृति।
सभ्यता और संस्कृति के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म अंतर है। आज के उपभोक्तावादी दौर में सभ्यता का अर्थ प्रायः पश्चिमी भोगवादी जीवन-शैली से जोड़ दिया गया है। ऐसे में संस्कार और सभ्यता का अर्थ कई बार सतही हो जाता है। जबकि संस्कृति का वास्तविक अर्थ उस अंतश्चेतना से है जो मानवीय गुणों से संपन्न हो और जिसके भीतर निरंतर रचनात्मकता प्रवाहित होती रहे।
जब मनुष्य का मन आध्यात्मिकता और आस्तिक भाव से भर जाता है, तब वह अपने आसपास के परिवेश के प्रति श्रद्धा और प्रेम से भर उठता है। इसी भाव से प्रेरित होकर वह नदियों को लोकमाता मानता है, वृक्षों की पूजा करता है और पर्वतों को अपने संरक्षक का स्थान देता है। यही भाव भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है, जहाँ जीवन का वास्तविक अर्थ संस्कृति में निहित माना गया है।
यह पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए जितनी उपयोगी है, उतनी ही विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों और शोध-मार्गदर्शकों के लिए भी नई शोध-दृष्टि प्रदान करती है।










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